Jain Stotra
15. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक
तं कत्थ बलं तं कत्थ ,
जुव्वणं अंगचंगिमा कत्थ ?।
सव्वमणिच्चं पिच्छह ,
दिट्ठं नट्ठं कयंतेण ॥१५ ॥
: अर्थ :
शरीरका बल कहाँ गया ? वह जवानी कहाँ चली गई । शरीर का सौंदर्य कहाँ चला गया ? काल इन सभी को तहस नहस कर देता है , अतः सब कुछ अनित्य हे , ऐसा समझो ।।15 ।।




