Jain Stotra
18. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक
चुलसीई किर लोए ,
जोणीणं पमुहसयसहस्साइं ।
इक्किक्कंमि अ जीवो ,
अणंतखुत्तो समुपन्नो ॥१८ ॥
: अर्थ :
इस संसार में जीव को उत्पन्न होने के लिए चौरासी लाख योनियाँ हैं । इन सब में यह जीव अनंती बार पैदा हुआ है ॥18 ॥




