Jain Stotra
19. Vairagya Shatak | वैराग्य शतक
मायापियबंधूहि ,
संसारत्थेहिं पूरिओ लोओ ।
बहुजोणिनिवासीहिं ,
न य ते ताणं च सरणं च ॥१ ९ ॥
: अर्थ :
इस संसार में रहे हुए और चौरासी लाख योनि में बसे हुए माता – पिता व बंधु द्वारा यह लोक भरा हुआ है , परंतु रक्षण करनेवाला या शरण देनेवाला कोई नहीं है ।।19 ।।




